उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती में ‘सफेदपोश’ कसाई: स्वस्थ नवजात को 16 दिन ‘बीमार’ बताकर की लूट, फर्जीवाड़े की खुली पोल!

दिल में छेद का 'झूठ' और मासूम की 'तड़प': बस्ती के अस्पताल में इलाज के नाम पर खौफनाक खेल। इलाज या 'व्यावसायिक अपराध'? बस्ती में अस्पताल की घिनौनी करतूत, फर्जी जांच रिपोर्ट से परिजनों को बनाया बंधक।

अजीत मिश्रा (खोजी)

चिकित्सा के नाम पर ‘सफेदपोश’ लूट: क्या अब अस्पताल ‘कसाईखाने’ बन गए हैं?

  • क्या अस्पताल अब कसाईखाना बन गए हैं? स्वस्थ बच्चे को 16 दिन भर्ती रख की ‘क्रूर’ वसूली, जांच में पुष्टि।
  • ‘लाइफ लाइन’ बनी ‘डेथ ट्रैप’: बस्ती में डॉक्टर के फर्जीवाड़े का खुलासा, स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल।
  • बस्ती का मेडिकल स्कैम: स्वस्थ नवजात को दिल में छेद बताकर लूटे लाखों, डॉक्टर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज।
  • इलाज के नाम पर ‘मानवीय अपराध’: बस्ती के अस्पताल में हुआ मासूम के साथ खिलवाड़।
  • डॉक्टर का ‘फर्जीवाड़ा’ बेनकाब: 16 दिन अस्पताल में कैद रहा नवजात, जांच रिपोर्ट ने खोली पोल।

बस्ती: चिकित्सा का पेशा समाज में सबसे पवित्र और विश्वसनीय माना जाता रहा है। एक डॉक्टर को ईश्वर का दूसरा रूप कहा जाता है, जो जीवन दान देता है। लेकिन बस्ती से सामने आया एक मामला इस विश्वास की नींव को हिला देने वाला है। ‘लाइफ लाइन’ जैसे अस्पतालों ने सेवा के नाम पर जिस तरह से ‘ठगी का जाल’ बुना है, वह न केवल शर्मनाक है बल्कि मानवता के खिलाफ एक अपराध है।

स्वस्थ नवजात, बीमार अस्पताल

क्या यह कल्पना से परे नहीं है कि एक स्वस्थ नवजात शिशु को ‘दिल में छेद’ का डर दिखाकर 16 दिनों तक अस्पताल के बिस्तर पर कैद रखा जाए? यह कोई चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘व्यावसायिक षड्यंत्र’ है। एक परिवार जिसे अपने नन्हे बच्चे के स्वागत की खुशियाँ मनानी चाहिए थीं, उसे 16 दिनों तक मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक शोषण की भट्टी में झोंक दिया गया। यह सिर्फ उपचार नहीं, बल्कि एक मासूम के जीवन के साथ खिलवाड़ है।

सीओ की जांच और ‘कातिल’ लापरवाही

क्षेत्राधिकारी सत्येंद्र भूषण तिवारी की जांच रिपोर्ट ने उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया है जिन्हें अस्पताल प्रबंधन पर्दे के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहा था। ‘विगो’ लगाने-हटाने की अमानवीय प्रक्रिया ने बच्चे को किस नरक से गुजारा होगा, इसका अंदाजा लगाना भी रूह कंपा देता है। जब लखनऊ के राम मनोहर लोहिया संस्थान में जांच हुई, तो दिल में छेद का ‘भूत’ गायब हो गया। सवाल यह है कि यदि वह बच्चा समय पर सही अस्पताल न पहुँचता, तो क्या वह जीवित बच पाता?

डिग्रियों का खेल और जवाबदेही का सवाल

मामले की तह में स्वास्थ्य विभाग की जांच में सामने आई डॉक्टर सोहेल की डिग्री की संदिग्धता और गलत 2-डी इको रिपोर्ट, इस पूरे तंत्र की कलई खोलती है। क्या बिना वैध योग्यता के लोगों को अस्पताल चलाने की खुली छूट मिल गई है? लाइफ लाइन अस्पताल के संचालक का यह कहना कि ‘जांच में कुछ नहीं मिला’, उनकी संवेदनहीनता को दर्शाता है। यदि वे निर्दोष हैं, तो जांच से डर कैसा?

प्रशासन की भूमिका: क्या कार्रवाई मात्र खानापूर्ति होगी?

मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा चिकित्सीय बोर्ड गठित करने का निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन यह कार्रवाई केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अक्सर ऐसे मामलों में भारी-भरकम जुर्माने या अस्पताल को कुछ समय के लिए सील करने तक सीमित कार्रवाई दोषियों का हौसला और बढ़ा देती है। जब बात किसी नवजात की जान और माता-पिता के विश्वास की हो, तो यह ‘धोखाधड़ी’ नहीं, बल्कि ‘आपराधिक कृत्य’ की श्रेणी में आता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में पनप रही यह ‘लूट की संस्कृति’ समाज के लिए नासूर बन चुकी है। यदि समय रहते दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो जनता का भरोसा इस पूरी प्रणाली से उठ जाएगा। अस्पताल केवल मुनाफे की मशीन नहीं होने चाहिए। बस्ती का यह मामला पूरे जिले के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है।

समय आ गया है कि इन सफेदपोश कसाइयों की पहचान की जाए और उन्हें उस हद तक दंडित किया जाए कि आगे से किसी अस्पताल की फाइल में कोई ‘स्वस्थ बच्चा’ बीमार न लिखा जाए।

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